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Tuesday, 25 February 2014

अगीत की शिक्षाशाला.....कार्यशाला १७.. अगीत छंद व उनका रचना विधान....नव अगीत छंद ...

            अगीत की शिक्षाशाला.... अगीत में रस छंद अलंकार योजना---क्रमश ... अगीत- छंद....      

                                              
               (   लय व गति  काव्य-विधा के अपरिहार्य तत्व व विशेषताएं हैं जो इसे गद्य-विधा से पृथक करती  
 है  |  यति --काव्य को संगीतमयता के आरोह-अवरोह के साथ कथ्य व भाव को अगले स्तर पर परिवर्तन की  
स्पष्टता से विषय सम्प्रेषण को आगे बढाती है |  तुकांत बद्धता ..काव्य के शिल्प सौंदर्य को बढाती है परन्तु  

संक्षिप्तता, शीघ्र भाव-सम्प्रेषणता व अर्थ-प्रतीति का ह्रास करती है | अतः वैदिक छंदों व ऋचाओं की अनुरूपता  
व तादाम्य लेते हुए अगीत मूलतः अतुकांत छंद है | हाँ लय व गति इसके अनिवार्य तत्व हैं तथा तुकांत, यति,  
मात्रा व गेयता का बंधन नहीं है | अगीत वस्तुतः अतुकांत गीत है |

                      अगीत कविता का मुख्य अभिप्राय: है राष्ट्र, समाज व जमीन से जुडी वह छोटी अतुकांत कविता जो पांच से दस पंक्तियों से कम या अधिक की न हो |  जिसमें लय व गति हो, गेयता का बंधन न हो एवं मात्रा- बंधन भी आवश्यक नहीं |  वर्तमान में अगीत काव्य-विधा में प्रचलित व प्रयोग होरहे विविध छंदों का नीचे वर्णन किया जा रहा है | वे छंद ये हैं-----
१- अगीत छंद ......२-लयबद्ध अगीत  ३-गतिमय सप्तपदी अगीत  ४-लयबद्ध षटपदी अगीत   ५-नव-अगीत ६-त्रिपदा अगीत   ७-त्रिपदा अगीत गज़ल ... )
 
                   कार्यशाला -१७...नव अगीत छंद....  .इस छंद का रचना विधान निम्न है..... 
१.अतुकांत लघु अगीत छंद
२.तीन से कम व पांच से अधिक पंक्तियाँ नहीं
३.लय, गति व मात्रा बंधन से मुक्त
४. मुख्यतया: सामाजिक सरोकारों, कटु सत्य, नवीन विचारों से युक्त परन्तु अनिवार्यता व बंधन नहीं |
 उदाहरण-----

" बेडियाँ तोडो 
ज्ञान दीप जलाओ ;
नारी ! अब-
तुम्हीं राह दिखाओ,
समाज को जोड़ो |"                               ------सुषमा गुप्ता

"मुस्तैद मित्र पुलिस 
हरदम तैयार ;
फिर भी नहीं मिली ,
उत्तम प्रदेश में-
चोरी गयी कार |"                                  -----डा श्याम गुप्त

"सावधान होजायें 
ऐसे दुमुहे 
मुझे न भाएँ ;
जो खाएं और गुर्रायें
इन दुमुहों के पास न जाएँ |"                     ---- सोहन लाल सुबुद्ध

"शब्द वेधी वाण ने 
हरे श्रवण के प्राण ;
कैकयी की वाणी ने .
वन  भेजा सुकुमार |"                                  --- पार्थो सेन  |


" बिंदुओं सी रातें 
गगन से दिन बनें ,
तीन ऋतु बीत जाएँ ,
बस
यूँही | "                                              
  -----मंजू सक्सेना      

" संकल्प ले चुके हम,
पोलियो मुक्त जीवन का,
धर्म और आतंक के ,
विष से मुक्ति का,
संकल्प
भी तो लें हम | " 
                      ---जगत नारायण पांडे 

                        ---- क्रमश ..कार्यशाला १८ .... त्रिपदा अगीत छंद....